बीते कुछ सालों में भारत ने चावल दान या निर्यात करके अपनी खाद्य कूटनीति का भरपूर इस्तेमाल किया है. चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया भर के कई देशों में चावल और गेहूं भेज रहा है.

 धुनिक कूटनीति  ऐसा बहुरंगी हथियार है जिसका इस्तेमाल करके एक देश राष्ट्रीय हितों को साधने के जतन करता है. इसमें खाद्य कूटनीति भी शामिल है जिसका इस्तेमाल भारत भी करता है. बीते कुछ सालों में भारत ने चावल दान या निर्यात करके अपनी खाद्य कूटनीति का भरपूर इस्तेमाल किया है. हाल ही में, सरकार ने कुछ देशों के गेहूं और टूटे चावल भेजने के अनुरोधों के बाद निर्यात को मंजूरी देने का फैसला किया है.

भारत ने पहले स्थानीय कीमतों को स्थिर करने के प्रयास में 2022 में गेहूं और टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. टूटे चावल का इस्तेमाल जानवरों के चारे के लिए किया जाता है. हालांकि, सरकार ने अब इस वित्त वर्ष में इंडोनेशिया, सेनेगल और गाम्बिया को टूटे चावल के निर्यात का फैसला लिया है. इसके अलावा, भारत ने गेहूं भेजने की इजाजत भी दी है. इसी अवधि में नेपाल को भी निर्यात किया जाएगा.

अमेरिका ने भी खाद्य कूटनीति का खूब इस्तेमाल किया है. उसने शीत युद्ध के दौरान अविकसित देशों में साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए एक कूटनीतिक हथियार के रूप में खाद्य सहायता का उपयोग किया. 1964-66 के दौरान भारत भी अमेरिकी खाद्य सहायता हासिल करता था, जब बड़ी मात्रा में गेहूं का आयात हुआ. अमेरिका ने 1973 में सोवियत संघ को सब्सिडी वाले गेहूं और मक्का की भी आपूर्ति की, जिसका वैचारिक महत्व था.

इसी तरह, भारत आज अपने खपत से ज्यादा उपलब्ध अनाज भंडार को राजनयिक और आर्थिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रहा है. वह खाद्य संकट का सामना कर रहे देशों के साथ इस अधिशेष को दान करने या व्यापार की हर संभावना  को तलाश रहा है.

खाद्यान्न भेजने के मामले में चीन के बाद भारत दुनिया भर में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसका विश्व व्यापार में 40% हिस्सा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चावल का उत्पादन 1980 में 5.36 करोड़ टन से बढ़कर 2020-21 में 12 करोड़ टन हो गया.

घरेलू चावल की कुछ सबसे पुरानी किस्मों में पूर्वी हिमालय की तलहटी में  पैदा होने वाला 'इंडिका' और दक्षिणी चीन में उगने वाला 'जापोनिका' शामिल हैं. भारत बासमती चावल का प्रमुख निर्यातक है.

वित्तीय वर्ष 2022-23 में, देश ने 17.3 मीट्रिक टन की तुलना में 17.79 मीट्रिक टन गैर-बासमती चावल का निर्यात किया, जबकि टूटे हुए चावल का निर्यात 3 मीट्रिक टन से 23% कम था. पिछले साल सितंबर में भारत ने टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था और गैर-बासमती किस्मों पर 20% निर्यात शुल्क लगाया था. ऐसा घरेलू आपूर्ति की कमी को दूर करने और खराब फसल के बाद कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लागू की गई थी.

इसी साल मार्च में, भारत सरकार ने चार देशों को अपने कूटनीतिक खाद्य सहायता कार्यक्रम के मुताबिक गेहूं और चावल जैसे लगभग एक करोड़ टन अनाज के निर्यात को मंजूरी दी. 

चावल के जरिये बनते संबंध

2019 की तुलना में अप्रैल 2022 से अगस्त 2022 के बीच टूटे चावल के निर्यात में 417 प्रतिशत की बढ़त हुई. निर्यात मुख्य रूप से चीन, सेनेगल, वियतनाम, जिबूती और इंडोनेशिया को होता है. देश ने पिछले पांच महीनों में करीब 21.31 लाख मीट्रिक टन टूटे चावल का निर्यात किया. हालिया फैसले से फायदा उठाने वाले देशों में से एक इंडोनेशिया है जहां अल नीनो के मौसमी प्रभाव के चलते घरेलू आपूर्ति में दिक्कत बनी हुई है. इंडोनेशिया ने करीब 1 करोड़ टन चावल आयात करने के लिए भारत से डील की है.

जानकारों का अनुमान है कि इस फैसले से ना केवल शामिल देशों को लाभ होगा बल्कि भारत में कृषि क्षेत्र के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा. इसी साल मार्च में भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने कई देशों में बड़ी मात्रा में टूटे चावल के शिपमेंट को मंजूरी दी. करीब 100,000 टन टूटा हुआ चावल गाम्बिया और 250,000 टन सेनेगल को विशेष रूप से भेजा जाएगा. जबकि, 9,990 टन टूटे चावल का एक और शिपमेंट जिबूती और इथियोपिया को निर्यात करने की मजूरी दी गई.चावल निर्यात पर भारत की रोक से दुनियाभर में अफरा-तफरी

दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान सूखे, सत्ता पलट और अस्थिरता के कारण भोजन की गंभीर कमी का सामना कर रहा है, जबकि श्रीलंका भी आर्थिक मंदी  के दौर में भोजन के संकट से जूझ रहा है. अमेरिका के पीएल-480 कार्यक्रम की तरह भारत ने स्थानीय मुद्रा में भुगतान स्वीकार करते हुए, अफगानिस्तान को गेहूं और श्रीलंका को चावल की मानवीय सहायता की पेशकश करता हुआ नजर आया.

 भारतीय कंपनी ने क्यूबा और पड़ोसी लैटिन अमेरिकी और कैरिबियन देशों को 300,000 मीट्रिक टन चावल और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति के लिए एक डील की है.

न्यूज़ सोर्स : ipm